कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने और इस दौरान कमेटी बनाकर किसानों की आशंकाएं दूर करने का केन्द्र का प्रस्ताव किसानों को मंजूर नहीं है। किसान नेताओं ने गुरुवार की शाम केंद्र की उस पेशकश को नामंजूर कर दिया जिसमें 18 महीनों के लिए तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को स्थगित करने की बात कही गई थी। किसान नेताओं ने कहा कि वे तीनों कानूनों को रद्द करने से कम पर कोई समझौता नहीं करेंगे।

किसानों के इस फैसले को लेकर कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई और सिर्फ एक प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई। जबकि हर बार किसान संगठनों की मीटिंग के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और ज्यादातर नेता बोलते हैं, लेकिन गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर दी गई और मीटिंग खत्म होने के बाद एक छपा हुआ बयान डॉ. दर्शन पाल की तरफ से जारी किया गया। इसमें लिखा था-‘संयुक्त किसान मोर्चा की आम सभा में सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया है। आम सभा में तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को पूरी तरह रद्द करने और सभी किसानों के लिए सभी फसलों पर लाभदायक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए एक कानून बनाने की बात, इस आंदोलन की मुख्य मांगों के रूप में दोहराई गई।’

सरकार के प्रस्ताव पर किसान संगठनों के नेताओं ने दिन भर विचार किया। आमतौर पर सरकार के साथ बातचीत में किसान संगठनों के 40 नेता शामिल होते हैं। अब तक सरकार के साथ 10 दौर की बातचीत हो चुकी है और इसमें भी 40 संगठनों के नेता शामिल हुए। लेकिन गुरुवार को सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए सिंघु बॉर्डर पर हुई मीटिंग में 80 किसान संगठनों के नेताओं ने हिस्सा लिया।

मेरी जानकारी ये है कि किसान संगठनों ने भले ही बयान जारी करके सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो लेकिन इस मुद्दे पर किसान नेताओं में अभी एक राय नहीं है। किसानों के जो पुराने और अनुभवी नेता हैं, उनका कहना है कि सरकार के इस प्रस्ताव को मान लेना चाहिए। उन्होंने मीटिंग में अन्य किसान नेताओं को यह समझाने की कोशिश की कि एक बार कानून स्थगित हुए तो उन्हें वापस लाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इन नेताओं ने ये भी कहा कि इससे अच्छा प्रस्ताव दूसरा नहीं हो सकता है।

किसान आंदोलन में पंजाब से जो नेता आए हैं उनमें दो ऐसे हैं जिनका सपोर्ट बेस काफी बड़ा है और इनके ज्यादा लोग इस वक्त धरने पर बैठे हैं, वो इस बात पर अड़े हैं कि कानून को रद्द करने से कम पर समझौता नहीं करना चाहिए। इनका कहना है कि इस समय सरकार दबाव में है और 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च के प्लान से सरकार घबरा गई है। इसलिए अगर अड़े रहे तो सरकार को झुकना पड़ेगा और तीनों कानून रद्द करवा कर घर लौटे तो हमारी जीत मानी जाएगी।

वहीं कुछ पुराने और अनुभवी किसान नेता जिन्होंने कई आंदोलन देखे हैं, उनका कहना है कि अभी तो सरकार झुकने के मूड में है लेकिन अगर इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो सरकार का रुख बदल भी सकता है। सरकार का रुख और कड़ा हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो बातचीत का रास्ता बंद हो जाएगा और इसका इल्जाम किसान नेताओं पर लगेगा। इन लोगों ने ये भी कहा कि आज जनता से जो समर्थन और सहानुभूति मिल रही है वो भी चली जाएगी।

चिंता की बात ये है कि इन्हीं किसान नेताओं में एक बड़ा तबका है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोधी है। उनका एजेंडा किसानों का भला कम और मोदी विरोध ज्यादा है। ये वो लोग हैं जो किसान आंदोलन के नाम पर अपनी सियासत को चमकाना चाहते हैं, लेकिन उनका सपोर्ट बेस (जन समर्थन का आधार) कम है। ये लोग चाहते हैं कि आंदोलन चलता रहे।

इन लोगों ने किसान नेताओं से कहा कि अगर एक बार धरने से उठ गए तो दोबारा इतना बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर पाएंगे। इतना ही नहीं, इन लोगों ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की नोटिस का भी जिक्र किया और कहा कि अगर आंदोलन खत्म कर दिया तो और लोगों को ऐसे नोटिस मिल सकते हैं और फिर से लोगों को इकट्ठा करना संभव नहीं होगा।

किसान नेताओं की तरफ से अब 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली की कॉल देकर सरकार पर दबाब बनाने की कोशिश हो रही है। दिल्ली पुलिस की तरफ से ट्रैक्टर रैली की इजाजत किसानों को नहीं मिली है लेकिन किसान नेता अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इन नेताओं का दावा है कि ट्रैक्टर रैली के लिए किसान पहले ही पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी और कुछ अन्य राज्यों से दिल्ली के लिए रवाना हो चुके हैं।

अब सरकार की दिक्कत ये है कि वह किसानों पर सख्ती बरतना नहीं चाहती। अब तक किसानों के साथ प्रशासन-पुलिस ने बहुत संयम के साथ काम लिया है, लेकिन गणतन्त्र दिवस पर सुरक्षा को लेकर भी कोई समझौता नहीं हो सकता। किसान संगठनों के कुछ नेता ऐसे हैं जो इस बात को न तो सुनने को तैयार हैं और ना ही समझने को तैयार हैं।

मेरा किसान नेताओं से ये सवाल है कि आठ राज्यों के जो किसान नेता सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाई गई कमेटी के साथ बात करने पहुंचे, क्या वो किसान नहीं है? क्या वो किसानों का भला नहीं चाहते? पूरे देश के लाखों-करोड़ों किसान जो इस वक्त खेतों में काम कर रहे हैं और जो सरकार की तरफ से बनाए गए कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं, क्या उनकी बात सिर्फ इसलिए नहीं सुनी जानी चाहिए क्योंकि वो आंदोलन नहीं कर रहे हैं? सड़क पर नहीं बैठे और टकराव का रास्ता नहीं अपना रहे?

मुझे लगता है कि लोकतन्त्र में सबको अपनी बात कहने का हक है। जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उन्हें संविधान आंदोलन करने का हक देता है। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए और सरकार ने उनकी बात सुनी भी है। उनसे खुले दिल से बात की है। सरकार कृषि कानूनों में संशोधन करने के लिए तैयार है। सुप्रीम कोर्ट ने भी आंदोलन करने वाले किसानों के साथ हमदर्दी जताई है। लेकिन क्या सरकार के प्रस्ताव को नामंजूर करके, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से बात करने से इंकार करके किसान संगठन ठीक कर रहे हैं?

मेरा कहना ये है कि लोकतंत्र में रास्ता बातचीत से ही निकलता है इसलिए बातचीत का रास्ता बंद न हो ये सुनिश्चित करना चाहिए। किसान संगठनों को सरकार के प्रस्ताव पर एक बार फिर से सोचना चाहिए और जो लोग उग्र हैं, जो इसका विरोध कर रहे हैं उनको समझाने की कोशिश करनी चाहिए।