देश के दूसरे भाजपाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले भाजपाई प्रधानमंत्री अटलबिहारी के मुकाबले कम से कम इस अर्थ में खुशकिस्मत रहे हैं कि उन्हें भाजपा कहें या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की ओर से वैसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा है, जिसका अटल को प्रायः सामना करना पड़ता था। मोदी के कई समर्थक इसे इस रूप में देखते हैं कि इस परिवार के अंतर्विरोधों में संतुलन की जो साधना अटल बहुत चाहकर भी संभव नहीं कर पाते थे, मोदी ने अपने साम-दाम, दंड और भेद से उसे बांयें हाथ का खेल बना दिया है। 

अटल के वक्त उन पर ‘इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री’ समेत जितने भी ‘संगीन’ आरोप लगाये या निजी हमले किये गये, संघ परिवारियों की ओर से ही लगाये या किये गये। कई प्रेक्षकों के अनुसार इसका एक बड़ा कारण उनकी क्रास पार्टी अथवा क्रास गठबंधन लोकप्रियता थी, जो ज्यादातर संघ परिवारियों को सहन नहीं होती थी। 

लेकिन नरेन्द्र मोदी का मामला इसके एकदम उलट है। संघ परिवार अथवा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की कतारों के बाहर शायद ही कोई उनका प्रशंसक हो, लेकिन अंदर उनके महानायकत्व को लेकर लगभग सर्वानुमति है-जबर्दस्ती की हो या उसके वोट दिलाऊ होने के चलते। इसलिए कहते हैं कि उनके मंत्रिमंडल अथवा भाजपा संसदीय दल की बैठकों में भी, अपवादों को छोड़कर, कोई उनसे आंख नहीं मिला पाता। उनके विरोधी कहते हैं कि वहां आम तौर पर किसी को भी इसकी इजाजत नहीं है, क्योंकि मोदी अपना खेल बिगाड़ने वालों को न भूलते हैं, न क्षमा करते हैं। ऐसे में जल में रहकर मगर से वैर कौन मोल ले? 

लेकिन पिछले दिनों कम से कम दो ऐसे संकेत मिले, जिनसे लगता है कि धीरे-धीरे ही सही, यह स्थिति अब बदल रही है और इस बदलाव के पीछे मोदी सरकार की विफलताओं से पैदा हो रहे जनाक्रोश की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

इस बदलाव को यों समझ सकते हैं कि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, जो 2014 में गृहमंत्री के रूप में अपनी पसन्द के पर्सनल सेक्रेटरी के लिए तरसाये जाने पर भी चुप रह गये थे-2019 में मोदी के ही नेतृत्व में सत्ता में वापसी के बाद मंत्रिमंडल में दूसरे से तीसरे नम्बर पर धकेलकर रक्षामंत्री बना दिये जाने पर भी उन्होंने चुप्पी ही साधे रखी थी, 1999 में हुई कारगिल की लड़ाई में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने रविवार को जम्मू पहुंचे तो यह जानते हुए भी कि नरेन्द्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के कट्टर आलोचक हैं और उन्होंने अपने ‘न्यू इंडिया’ का सारा वितान आधुनिक भारत की नेहरूवादी परिकल्पनाओं के विरुद्ध ही खड़ा किया है, कह दिया कि 1962 में भले ही चीन ने हमारी मजबूरी का फायदा उठाकर हमारी जमीन कब्जा कर ली, मैं इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की नीयत पर सवाल उठाकर उनकी आलोचना नहीं कर सकता। न ही यह मान सकता हूं कि किसी प्रधानमंत्री की नीयत में खोट हो सकता है। 

अभी उनके इस कथन के निहितार्थ निकाले ही जा रहे थे कि दूसरे केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नागपुर में यह कहकर सनसनी फैला दी कि उन्हें लगता है कि उन्हें राजनीति छोड़ देनी चाहिए। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के समय से राजनीति देश, समाज, विकास के लिए होती आई है, लेकिन अब वह सिर्फ सत्ता के लिए होती है। 

गौरतलब है कि ऐसा कहते हुए उन्होंने भाजपा की राज्य सरकारों को तो छोड़िये, उस मोदी सरकार को भी सत्ता की राजनीति के लांछन से अलग करने की जरूरत नहीं समझी, जिसमें वे मंत्री हैं। वैसे भी, मंत्री होते हुए उनका राजनीति छोड़ने का मन होता है तो उसका कारण जानने के लिए किसी बड़े मानसिक व्यायाम की जरूरत नहीं है। यह समझने के लिए भी नहीं कि वे राजनीति छोड़ने की बात नैतिक दबाव की अपनी रणनीति के तौर पर कर रहे हैं, वास्तव में राजनीति छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं। 

यों, एक कार्टूनिस्ट ने उनके कथन को इस रूप में भी लिया है कि बेचारे, महंगाई, बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था की बदहाली की वजह से जनता का ताना सुनते-सुनते ऊब गये होंगे। प्रसंगवश, भाजपा नेताओं की पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई पर लम्बी होती चुप्पी के बीच वे कहते रहे हैं कि इससे देशवासी काफी गुस्सा हैं। 

गडकरी के बारे में कहा जाता है कि वे मोदी के इकलौते ऐसे मंत्री हैं, जो अपने चुने जाने या मंत्री पद के लिए खुद को उनका कृतज्ञ नहीं मानते, न ही उनका कोई अंकुश मानते हैं। इसलिए मंत्रिमंडल व पार्टी संसदीय दल की बैठकों में और उसके बाहर भी सरकार व पार्टी की लाइन से अलग विचार व्यक्त करते रहते हैं। इसीलिए पिछले दिनों नागपुर के एक अंग्रेजी दैनिक में खबर छपी कि मोदी मंत्रिमंडल की एक बैठक में एक मंत्री ने तैश में आकर कह दिया कि ‘विचारधारा से बंधा हूं, वर्ना…’ तो भी प्रेक्षकों ने अनुमान लगाया था कि वह मंत्री गडकरी ही थे, जिनका मानना रहा है कि राजनीतिक दलों के नेताओं को सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए, क्योंकि राजनीति समाज और उसका विकास करने के लिए होती है। 

पिछले दिनों एक बयान में गडकरी ने मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कमजोर होने से क्षेत्रीय पार्टियों के हावी होने पर चिंता जताई और कांग्रेस की मजबूती की वकालत की, तो भी माना गया था कि वे कांग्रेस मुक्त भारत के मोदी के आह्वान पर एतराज जता रहे हैं। हालांकि इससे पहले एक अन्य केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी इस तरह की बात कहने का जोखिम उठा चुके हैं।

पिछले साल एक कार्यक्रम में उन्होंने नेताओं के लालच पर चुटकी लेकर कहा कि उनमें शायद ही कोई खुश मिलेगा, साथ ही इसे लेकर अपने भाजपा की अध्यक्षता वाले दिनों का हवाला देते हुए कहा कि उस दौर में उन्हें कोई ऐसा नेता नहीं मिला जो दुखी न हो, तो उसे भी प्रकारांतर से भाजपा की रीति-नीति की आलोचना ही माना गया था। गडकरी ने अपनी बात में यह भी जोड़ा था कि अब तो राज्यों के मुख्यमंत्री भी आशंकित रहते हैं कि ना जाने उन्हें कब हटा दिया जाए। यह तब की बात है, जब भाजपा ने कुछ ही महीनों में कई भाजपाई मुख्यमंत्रियों को हटा दिया था। इससे पहले जनवरी 2019 में उन्होंने कहा था कि जो नेता लोगों को सपने दिखाते और पूरे नहीं कर पाते, जनता उनकी पिटाई ही करती है।

राजनाथ और गडकरी के ताजा बयानों को परिदृश्य के सर्वथा बदल जाने के रूप में न देखा जाये तो भी यह सवाल बना रहता है कि उनके सिर उठाने को किस रूप में लिया जाये? अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त संघ परिवारी उनकी आलोचना करते थे तो विपक्षी दल इसके पीछे सत्तापक्ष व विपक्ष दोनों की भूमिका हथियाने का उनका शातिराना चाल देखते थे। लेकिन आज की बदली हुई परिस्थितियों में जब वास्तविक विपक्ष लगातार बिखरता व कमजोर होता दिख रहा है, मोदी के पक्ष यानी सत्तापक्ष से ही उनके प्रतिपक्ष के झाँकने लग जाने को क्या उसी कसौटी पर देखा और कहा जा सकता है कि लस्त-पस्त विपक्ष मोदी सरकार की नाकामियों से उपजे असंतोष को भुनाकर शक्तिशाली न हो जाये, इसलिए संघ परिवार द्वारा भाजपा के भीतर ही एक विपक्ष खड़ा किया जा रहा है? 

एक प्रेक्षक ने तो पूछा भी है कि क्या भाजपा के नक्कारखाने में बजने वाली ये तूतियाँ भी जनता को बरगलाने के लिए ही हैं? उसके प्रश्न हैं: राजनाथ व गडकरी दोनों के दुःख एकाकार हैं या अलग-अलग? वे सचमुच दुखी हैं या उन्हें दुखी दिखने को कहा गया है? और वे सचमुच दुःखी हैं तो मंत्रिमंडल व पार्टी संसदीय दल की बैठकों या संसद की कार्यवाही में मुखर क्यों नहीं होते? 

इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है। लेकिन इस सारे घटनाक्रम को गडकरी को राजनाथ का भी साथ मिल जाने के रूप में क्यों नहीं देखा जा सकता और इन सवालों के सिलसिले में गडकरी के इस कथन को क्यों नहीं दोहराया जा सकता कि क्रिकेट और राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है और जो मैच हारता हुआ दिखाई दे रहा हो, वह जीत भी सकता है? खासकर जब देश के संसदीय इतिहास में अकेले बहुमत वाले सत्ता दलों में भी असंतोषों और बगावतों की मिसालों की कोई कमी नहीं है। 

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